Intro
कुछ आँखें थकी हुई नहीं लगतीं…बस गहरी लगती हैं।
जैसे उन्होंने रात सिर्फ बिताई नहीं,थोड़ी -सी जी भी लिया हो।
कभी-कभी एक पुराना गीत याद आ जाता है—
“गोरी, तेरी आँखें… कहे की रात भर सोई नहीं…..”
और ये सवाल हल्का-सा मुस्कुरा कर नहीं, धीरे से ठहर कर सुनाई देता है।
शायद इसलिए…क्योंकि हर जागी हुई रात की वजह
हमेशा एक जैसी नहीं होती।
Poem
गोरी, तेरी आँखें कहे …की रात भर सोई नहीं
क्या चाँद से बातें करती रही तू,
या ख़ुद से ही रूठी थी कहीं?
उनमें थोड़ा सा काजल है,
और थोड़ी सी कहानी भी—
जैसे हर पल चुपके से
किसी याद ने उंगली थामी हो अभी।
ना नींद का नशा,
ना ख़्वाबों का असर,
फिर क्यों इतनी गहरी लगती हैं
जैसे दो गहरे समंदर?
गोरी, तेरी आँखें झूठ नहीं बोलती,
ये दिल का राज़ खोल देती हैं—
तू छुपाती बहुत है,
पर ये कह देती हैं… कोई बात तो है।
शायद किसी का इंतज़ार था,
या किसीके आने की आहट,
इसीलिए रात भर जागती रही तू…
सुबह भी तेरी आँखों …शाम सी है।
अब इन पलकों पर सिर्फ़ रात नहीं ठहरी,
सालों की हल्की सी धूल भी है—
कुछ ख़्वाब जो संभाल कर रख दिए,
कुछ जो चुपके से छोड़ दिए कहीं।
अब जागना आदत सी लगने लगी है,
पर बेचैनी का नाम नहीं—
जैसे ज़िंदगी को समझने में
नींद थोड़ी कम पड़ गई हो कहीं।
उन आँखों ने बहुत कुछ देखा है—
रुकना, चलना, फिर से मुस्कुराना,
ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा बाँट देना,
और फिर भी पूरा रह जाना।
गोरी, अब तेरी आँखें सवाल नहीं करतीं,
बस धीरे से समझ लेती हैं—
हर रात का मतलब नींद नहीं होता,
कुछ रातें… जीने के लिए होती हैं।
और सुबह जब आईना देखें तू ,
थोड़ी सी बदली हुई लगती है—
कम नहीं हुई है रोशनी तेरी,
बस प्रकाश है जो जगमगा रहा है।
Outro
शायद उम्र हमें थकाती नहीं…बस हमें थोड़ा और गहरा बना देती है।
और कुछ आँखें—वो नींद से नहीं,
अनुभवों से चमकती हैं।
शायद इसलिए, हर जागी हुई रात
कमज़ोरी नहीं होती—कभी-कभी वो हमारी
सबसे खामोश ताक़त होती है।
This Peom is part of blogchatter A2Z Challenge


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