Intro
कुछ अक्षर आसान होते हैं—उन पर लिखते हुए शब्द खुद आ जाते हैं।
और कुछ…थोड़ा ठहरकर लिखने पड़ते हैं।
“H” उन्हीं में से एक लगा।
शायद इसलिए क्योंकि हदें और हसरतें—
दोनों साथ रहते हुए भी अक्सर एक-दूसरे से अनकही लड़ाई में होते हैं।
ये कविता उसी बीच की जगह से निकली है—जहाँ कुछ छूटा भी है,
और कुछ अब भी जन्म ले रहा है…

Poem
कुछ हसरतें थीं—
ओस की बूँदों जैसी,
धूप लगते ही
बस हवा हो गईं।
कुछ को मुट्ठी में जकड़ रखा था,
पर उँगलियों की दरारों से – बह गई।
अब भी कभी-कभी
हथेलियों पर नमी महसूस होती है—
जैसे कोई ख़्वाब
पूरी तरह सूखा नहीं।
हदें पहले दीवारों सी थीं,
ऊँची, ठंडी, अनजानी—
जिनके उस पार
मैं खुद को छोड़ आती थी हर बार।
फिर एक दिन
रेत पर लकीर खींचना सीखा—
हल्की सी,
पर अपनी।
अब लहरें आती हैं,
छूकर लौट जाती हैं…
और मैं हर बार
वही खड़ी रह जाती हूँ।
अंदर कहीं
एक धीमी आँच है—
ना लपट, ना धुआँ,
बस एक ज़िद
जो राख होने से इंकार करती है।
कहती नहीं,
बस बनाती रह—
टूटे टुकड़ों से भी
कुछ आकार, कुछ मायने।
कभी-कभी
रात के सन्नाटे में
वो आँच थोड़ी तेज़ हो जाती है—
जैसे कोई अधूरी धुन
खुद को पूरा करना चाहती हो।
अजीब है ना—
पत्थरों के बीच भी
नरम काई उग आती है,
वैसे ही
इस दिल ने सख़्त होना नहीं सीखा।
अब भी कुछ कोने हैं
जहाँ धूप रखी है,
जहाँ थके कदमों को
थोड़ी जगह मिल जाती है।
और एक छोटा सा आँगन —
जहाँ कुछ लोग
बिना दस्तक के आ सकते हैं।
कुछ हसरतें
अब नाम नहीं माँगतीं,
बस हवा की तरह
आती-जाती रहती हैं।
और कुछ नई—
बीज की तरह
चुपचाप मिट्टी में पड़ी हैं,
सही मौसम का इंतज़ार करती हुई।
कभी एक हल्की सी बारिश होती है,
और लगता है—
शायद इनमें से कोई
जड़ पकड़ लेगी इस बार।
मैं अब
समंदर नहीं बनना चाहती,
बस एक किनारा—
जहाँ लहरें आएँ,
और लौट भी सकें।
जहाँ ठहराव भी हो,
और रुख़्सत की जगह भी।
हदें भी रहें,
और हसरतें भी…
अपने-अपने स्वर में,
बिना एक-दूसरे को डुबोए।
और शायद—
यही काफी है…
कि जो खो गया,
वो भी कहीं न कहीं
रौशनी बनकर ठहरा है,
और जो आना है,
वो रास्ता पूछते हुए
धीरे-धीरे पास आ रहा है।

Outro
शायद हर अक्षर सिर्फ़ एक शब्द नहीं होता—
कभी-कभी वो एक पूरा जीवन समेटे होता है।
“H” ने सिखाया—
खुद को खोए बिना भी महसूस किया जा सकता है।
और आप?
आपकी हदें…
और आपकी हसरतें—
आज किस जगह खड़ी हैं?
This Poem is part of A2Z Blogchatter challenge 2026
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